Tuesday, 5 March 2019

गलतफहमियों की वजह ढूंढते हो;
चलो, छोडो, जाने दो, क्या ढूंढते हो!

जो थी राह खुद भूल जाने के काबिल,
तो क्यूँ तुम सफर के निशाँ ढूंढते हो!

जमाने की बातों में आकर अचानक,
रकीबों में अपना खुदा ढूंढते हो!

मज़े लेंगे सब, साथ कोई न देगा;
बुरे दौर में आशना ढूंढते हो!?

भरोसा है गर, मेरी आँखों में देखो;
ये हर वक़्त क्यूँ आइना ढूंढते हो?

गले से लिपट कर जरा मुस्कुरा दो!
ख़ुशी सामने है, पता ढूंढते हो!?

: हिमल पंड्या
આગળ વધી જવાની કોશિશ કરી હતી મેં,
પાછા ફરી જવાની કોશિશ કરી હતી મે;

રસ્તાએ રસ્તા વચ્ચે રોકી લીધો મને કાં?
મંજિલ સુધી જવાની કોશિશ કરી હતી મેં;

એવું થયું પછી, કે મારો ય ના રહ્યો હું!
તારા થઈ જવાની કોશિશ કરી હતી મેં;

ન્હોતો હું કોઈ સપનું, ના આરઝૂ, ન ઈચ્છા,
તો યે ફળી જવાની કોશિશ કરી હતી મેં;

દરિયો અગાધ ઊંડો, ડૂબાડશે એ નક્કી,
જેને તરી જવાની કોશિશ કરી હતી મેં;

એ વાત છે અલગ કે મહેંકી નથી શકાયું!
જાતે બળી જવાની કોશિશ કરી હતી મેં;

પોતીકી ‘પાર્થ’ લાગી પીડા ય એ ઘડીથી,
ખુદથી ખરી જવાની કોશિશ કરી હતી મેં.

: હિમલ પંડ્યા
कौन सा ऐसा कसब होता है,
जो भी होता है, गज़ब होता है

जादू-टोना कभी, कभी खंजर,
उसकी आंखों में वो सब होता है

जब से देखा है हसीं चेहरे को,
मुझको लगता है कि रब होता है

उसका दीदार, अपनी बेताबी,
जब ये होता है, वो तब होता है 

शाम ये एेसे ही नहीं ढलती,
उससे मिलने का सबब होता है

: हिमल पंड्या

तुज़ ही को सोचता हूँ फिर भी तेरा क्यूँ नहीं होता?
घनी रातों का कोई भी सवेरा क्यूँ नहीं होता?

तूं सामिल है मेरी हर सांस में, मेरे तसव्वुर में;
तुम्हारी ज़िन्दगी में मेरा हिस्सा क्यूँ नहीं होता?

कभी ताउम्र मिल जाए कोई दो चाहने वाले!
ज़माने भर में ऐसा कोई किस्सा क्यूँ नहीं होता?

हंमेशा कोसते रहेते हो मेरी हर कमी को तुम!
लो, अब तो मैं भी हैरां हूँ मैं अच्छा क्यूँ नहीं होता?

खुद ही निकले थे मुज़को क़त्ल कर के अपने हाथों से;
खुद ही अब पूछते हो कि मैं ज़िन्दा क्यूँ नही होता?

: हिमल पंड्या
कोई आया, रोशनी-सी दे गया!
मेरे होठों को हँसी-सी दे गया!

दिल के सूने आसमानों में कोई;
ऐसे निकला, चांदनी-सी दे गया! 

लफ्ज़ कुछ़ बिखरे पडे़ थे दरमियां;
अपना मिलना शायरी-सी दे गया!

एसे ढलका आप का आंचल वहां;
कि यहां पे खलभली-सी दे गया!

जाते-जाते मुड़ के देखा आपने;
वो नज़ारा तिश्नगी-सी दे गया!

एक पल की थी हमारी दासताँ;
एक पल एक ज़िन्दगी-सी दे गया!

: हिमल पंड्या

Friday, 28 December 2018

જેવા છો એવા દેખાશો,
ચ્હેરા બદલી ક્યાં સંતાશો?

પરદો ઊઠે ને ભજવાશો,
પરદો પડશે, પાછા જાશો.

ઊલટથી જો આવ્યું છે તો,
ગીત કહો ને! ક્યારે ગાશો? 

જૂઠ્ઠાના સઘળા સંગાથી,
સાચું કહેશો તો દંડાશો.

જીવતરના અંધારે જીવણ!
ક્યાં લગ આમ જ ગોથાં ખાશો?

સૂરજ થાવું અઘરું છે તો,
દીવો થઈને સ્હેજ પ્રકાશો.

: હિમલ પંડ્યા
चाहे दिन भर रहो हिज़ाबों में,
तुमको आना है मेरे ख्वाबों में!

तेरे आंचल को छु लिया होगा!
खुश्बु यूं ही नहीं गुलाबों में.

प्यार मुझसे है, मुझको दिखता है;
चाहे इनकार हो जवाबों में.

तुमने आँखों से पिलाई होगी,
वरना कैसा नशा शराबो में? 

अब बिना ड़र के घूम सकते है,
लोग चेहरे लिए नकाबों में.

वो सबक जिंदगी सिखाएगी,
जो नहीं थे कभी किताबों में.

:  हिमल पंड्या